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अस्पताल की आग में बच्ची खोने वाले कपल को मिला 10 लाख मुआवजा

मुंबई, मुंबई के अंधेरी में मरोल स्थित ईएसआईसी कामगार अस्पताल की आग में विरार कपल ने अपनी बच्ची गवां दी थी। विभाग ने बच्ची के माता-पिता को दस लाख की जगह दो लाख रुपये मुआवजा दिया था। अधिकारियों ने उनसे कहा था कि बच्ची वैसे भी मर ही रही थी। यह मामला मीडिया में आने के बाद विभाग ने अपनी भूल मानी और बच्ची के माता-पिता को दस लाख रुपये का चेक सौंपा। मरोल अस्पताल में यह आग 17 दिसंबर को लगी थी। यहां पर विरार के कपल अनिल और ललिता के जुड़वां बच्चे भी भर्ती थी। वेंटिलेटर पर रखी बच्ची को लगभग 45 मिनट तक बिना वेंटिलेटर के रखा गया। आरोप है कि इसके चलते बच्ची की मौत हो गई थी। हादसे में मारे गए लोगों के परिजनों को विभाग ने दस-दस लाख रुपये मुआवजा दिया जबकि बच्ची के माता-पिता को सिर्फ दो लाख का चेक यह कहते हुए दिया गया कि बच्ची पहले से ही मर रही थी। 

ESIC के ऐडिश्नल कमिश्नर संजय कुमार सिन्हा ने सफाई देते हुए कहा कि जब चेक तैयार किए जा रहे थे तब बच्ची घायल थी। उसकी मौत के सूचना विभाग को नहीं दी गई थी इसलिए बच्ची के परिजनों को घायल के मुआवजे वाला चेक दिया गया। विभाग ने भूल सुधार ली है और बच्ची के परिजनों के लिए दस लाख रुपये का चेक तैयार कर लिया गया है। अनिल और ललिता ने बताया कि उनकी बच्ची की मौत 22 दिसंबर को हुई थी उन्हें आश्चर्य है कि 25 दिसंबर की लिस्ट में उसका नाम घायलों में ही था। हालांकि बच्ची के माता-पिता ने कहा कि अधिकारियों ने उन्हें दो लाख मुआवजा देकर उसी में संतुष्ट होने को कहा था। 

संजय कुमार ने कहा, 'जब एक बार मुआवजे की घोषणा हो जाती है तो हर पीड़ित को निर्धारित मुआवजा दिया जाता है। उसे कोई नहीं काट सकता है। मुआवजा देने की एक प्रक्रिया होती है जो हमें फॉलो करनी पड़ती है। सामान्यता हमें तहसीलदार के दफ्तर से लिस्ट मिलती है। हम उस लिस्ट की डिटेल अस्पताल की डिटेल के साथ चेक करते हैं। क्योंकि हम मुआवजा बांटने में देरी नहीं करना चाहते थे इसलिए हमें तहसीलदार से जो लिस्ट मिली हमने उसी के आधार पर मुआवजा बांटा। उन्होंने कहा कि यही कारण है कि 11 मृतकों में से आठ पीड़ित परिवारों को मुआवजे का चेक दिया गया है। बाकी की जो तीन मौतें बाद में हुईं इसलिए उन्हें मुआवजा नहीं मिला है।'  

बच्ची का जन्म ESIC हॉस्पिटल में 14 दिसंबर को हुआ था। जन्म के समय बच्ची का वजन 800 ग्राम था जबकि उसके जुड़वां भाई का वजन 1.5 किलो था। तीन दिन अस्पताल के एनआईसीयू में रहने के बाद बच्ची का वजन घटकर 650 ग्राम हो गया। बच्ची की मां ने कहा, 'ESIC के डॉक्टरों ने हमें उस समय कहा था कि कई मामलों में 500 से 600 ग्राम बच्चों की जान बचाई जा चुकी है इसलिए उनकी बच्ची की जान एनआईसीयू में अच्छे इलाज से बचाई जा सकती है।' अस्पताल में आग लगने के बाद उनकी बेटी को वेंटिलेटर से हटा दिया गया। उसे एक अस्पताल से दूसरे अस्पताल ले जाया गया। इस दौरान लगभग 45 से 60 मिनट तक वह वेंटिलेटर से दूर रही। ललिता ने बताया कि शादी के छह साल बाद आईवीएफ के जरिए उसने जुड़वां बच्चों को जन्म दिया था।



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