नागपुर. सरकारी, अर्द्ध सरकारी कर्मचारियों द्वारा विविध मांगों को लेकर की गई हड़ताल की वजह से समूची व्यवस्था लड़खड़ा गई. मेडिकल, मेयो, डागा, आंबेडकर हास्पिटल सहित अन्य सभी सरकारी अस्पतालों में डाक्टर तो थे, लेकिन मरीजों का स्ट्रेचर खींचने वाले कर्मचारी नहीं थे. एक्सरे, ब्लड टेस्ट सहित विविध तरह के टेस्ट करने वाले लैब अटेंडेंट, टेक्निशियन ने भी हड़ताल में हिस्सा लिया. नर्स नहीं होने से मरीजों को भी परेशानी का सामना करना पड़ा.
बुधवार को देशव्यापी हड़ताल की गई. इसका सबसे ज्यादा असर स्वास्थ्य सेवाओं में देखने को मिला. सभी सरकारी अस्पतालों की नर्सें, अडेंटेंट, टेक्निशियन, लैब अटेंडेंट, सफाई कर्मचारियों ने हड़ताल में हिस्सा लिया, सुबह 8 बजे की शिफ्ट से सभी अनुपस्थित थे. ओपीडी में डाक्टरों के साथ ही इंटर्न डाक्टरों को जिम्मेदारी सौंपी गई. वहीं एमबीबीएस की छात्राओं ने भी स्वास्थ्य सेवा को संभालने का काम किया.
विविध तरह के टेस्ट कराने के लिए भी परिजनों व मरीजों को भटकना पड़ा. टेक्निशियन नहीं होने से एक्स-रे, सोनोग्राफी के लिए लंबी कतार लगी रही. निवासी डाक्टरों के साथ ही इंटर्न डाक्टरों ने भी कमान संभाली. इन दिनों मौसम के बदलाव की वजह से संक्रामक बीमारियां बढ़ी हैं. यही वजह है कि ओपीडी में मरीजों की संख्या बढ़ने लगी हैं. नर्सों के बिना वार्ड में व्यवस्था संभालना मुश्किल हो जाता है. यही वजह रही कि मरीजों के रजिस्ट्रेशन से लेकर तो दवाई देने तक की जिम्मेदारी इंटर्न, निवासी डाक्टर और छात्रों ने संभाली. इस बीच बुधवार को ज्यादा आपरेशन नहीं हुए. आपरेशन रद्द किये गये. मेडिकल में मेजर 24 और माइनर 8 आपरेशन ही सके. यही स्थिति मेयो में भी बनी रही. रात में भी वार्डों में नर्सें नहीं थीं. गुरुवार की सुबह 8 बजे की शिफ्ट से सभी हड़ताली कर्मचारी काम पर लौटे.
एक ओर जहां अन्य सरकारी कार्यालयों में हड़ताल की गई, वहीं दूसरी ओर शिक्षकों ने काली फीत लगाकर केंद्र सरकार की नीतियों का विरोध किया, जबकि कुछ निजी अस्पतालों के शिक्षकों ने हड़ताल में हिस्सा लिया. शिक्षक भारती संगठन ने पहले ही हड़ताल का समर्थन किया था. इस वजह से शिक्षकों ने हड़ताल करने की बजाय काली फीत लगाकर काम किया. सरकारी-अर्धसरकारी कर्मचारी व शिक्षक शिक्षकेत्तर संगठन समन्वय समिति की ओर से अंशदायी पेंशन योजना लागू करने, महंगाई भत्ते का बकाया देने, स्कूलों को अनुदान देने, स्टाफ अप्रूवल का 28 अगस्त 2015 का निर्णय रद्द करने, अतिथि शिक्षक व अंशकालीन शिक्षकों की नियुक्ति को रद्द करने और रिक्त सीटें भरने की मांग की गई.
विदर्भ वैद्यकीय महाविद्यालय व स्वास्थ्य सेवा कर्मचारी संगठन (इंटक) की ओर से हड़ताल की गई. अध्यक्ष त्रिशरण सहारे ने बताया कि मोदी सरकार के दूसरे दफा सत्ता में आने के बाद रेलवे, डिफेन्स, बीमा, बैंक, एयरफोर्स और अन्य सार्वजनिक क्षेत्रों का निजीकरण किया जा रहा है. घाटे में चल रही सरकारी कंपनियों को निजी हाथों को सौंपा जा रहा है. इस वजह से अनेक कर्मचारियों की नौकरी चली गई.