हैडलाइन

लोगों से मिलकर खतरे टालता है मुंबई पुलिस का ये जवान

मुंबई, भीड़ भरे बाजार, बस का इंतजार करते यात्री, स्टेशनों के बाहर जुटे लोग या और कोई सार्वजनिक स्थान जिसे आतंकवादी अपना निशाना बना सकते हैं। इसी तरह से एक फोन कॉल से आपके बैंक अकाउंट से पैसे भी उड़ाए जा सकते हैं। अपराधियों की निशाने वाले उन सभी स्थानों पर जहां लोगों को नुकसान पहुंचाया जा सके, वहां आजकल मुंबई पुलिस के कुछ जवान पहले ही पहुंच जाते हैं। आइए ऐसे ही एक जवान से मुलाकात करते हैं। कहीं पर भी होता है 'प्रजेंटेशन' 

शनिवार की दोपहर ढाई बजे के करीब कालबादेवी के चौराहे पर स्थित ट्रैफ‌िक पुलिस की बीट चौकी पर सिविल ड्रेस में एक व्यक्ति लोगों को बैंक फ्रॉड के बारे में विस्तार से समझा रहा था। पहली नजर में लगा कि कोई बैंक मार्केटिंग एजेंट ग्राहकों के साथ कंपनी की पॉलिसी शेयर कर रहा होगा। प्रजेंटेशन के अंत में वो बंदा जब अपने फोन नंबर शेयर कर किसी भी खतरे के दौरान उसे सूचित करने को बोलने लगा, तब लगा कि मामला कुछ अलग है। बात करने पर पता चला कि वह शख्स एल.टी. मार्ग पुलिस के आतंक निरोधी दस्ते में काम करता है। नाम है पीएसआई सुधीर नारायण थोरात। घर से दफ्तर आते और घर जाते वक्त पीएसआई थोरात कुछ लोगों की भीड़ जुटाकर उन्हें खतरों से आगाह करना नहीं भूलते हैं। थोरात ने बताया कि पिछले 2 महीनों वो लोगों से मुलाकात करके उन्हें आतंकी खतरों या बैंक फ्रॉड जैसी घटनाओं के प्रति आगाह कर रहे हैं। 

रोजाना तीन-चार मीटिंग 

पीएसआई थोरात ने बताया कि उन्हें पुलिस द्वारा जो जिम्मेदारी दी गई है उसमें लोगों में जाकर नेटवर्क बनाना होता है। इसी सिलसिले में शुरुआत में लोगों से बातें होती रहीं। इससे पहले थोरात स्टेशन ड्यूटी पर थे, तब लोगों की सबसे ज्यादा शिकायतें बैंक फ्रॉड से जुड़ी होती थीं। अब जब नई ड्यूटी मिली, तो सोचा कि लोगों से बैंक फ्रॉड और अन्य खतरों की भी बात करनी चाहिए। रोजाना 3-4 बार लोगों से मीटिंग होती है। हर मीटिंग में 20-30 लोग तो होते ही हैं, यदि इनमें से दस लोगों को भी बात समझ में आ गई, तो वे किसी बैंक फ्रॉड से बच सकते हैं। थोरात ने बताया कि मार्केट एरिया में जाकर स्थानीय दुकानदारों से या बैंक के बाहर लोगों से वे बात करते हैं। सीनियर सिटिजन को खासतौर पर खतरों के बारे में बताते हैं और साथ ही आपातकालीन स्थिति से निपटने के लिए सुझाव भी देते हैं। 

मिल रहा है फीडबैक 

थोरात ने बताया कि आमतौर पर स्टेशनों पर अनाउंसमेंट के जरिए आतंकी खतरों या बैंक द्वारा फोन कॉल के जरिए ग्राहकों को आगाह किया जाता है, लेकिन इससे बहुत कम लोग अलर्ट होते हैं। लोगों से बातचीत करने पर सामने से सवाल-जवाब भी होते हैं, इससे लोगों की प्रतिक्रिया भी मिल जाती है। 



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