हैडलाइन

फर्जी तहसीलदारों के जरिए जमानत दिला रहे थे ठग, गिरफ्तार

मुंबई, कोर्ट से जमानत मिलने के बाद आरोपी तभी जेल से बाहर आता है, जब कोई जमानतदार उसे स्योरिटी दे। स्योरिटी के लिए कोर्ट को जो दस्तावेज दिए जाते हैं, उनमें से कुछ मामलों में दिए गए दस्तावेजों का पुलिस वेरिफिकेशन होता है। कुछ महीने पहले क्राइम ब्रांच ने एक ऐसे रैकेट का भंडाफोड़ किया था, जिन्होंने दस्तावेजों के वेरिफिकेशन के लिए अपने खुद के फर्जी पुलिस इंस्पेक्टर बना रखे थे। अब एक ऐसे गिरोह से जुड़े 3 लोग पकड़े गए हैं, जिन्होंने दस्तावेज बनाने और उनके वेरिफिकेशन, दोनों के लिए अपने फर्जी तहसीलदार बना लिए थे। गिरफ्तार आरोपी संतोष शिंदे, अब्दुल शेख व नजीर सैय्यद नालासोपारा के रहने वाले हैं। किला कोर्ट ने सभी को 7 दिन की क्राइम ब्रांच कस्टडी में भेज दिया है। डीसीपी दिलीप सावंत के निर्देश पर फर्जी स्योरिटी से जुड़े केस में बुधवार को 3 और लोग भी गिरफ्तार हुए हैं। इनके नाम हैं उस्मान मोहम्मद, इमरान शेख और राशिद खान। खास बात यह है कि इसमें शिकायतकर्ता आजाद मैदान पुलिस स्टेशन में बना खुद किला कोर्ट है। 

क्राइम ब्रांच के एक अधिकारी के अनुसार, किसी केस में जब आरोपी को 30 हजार रुपये तक जमानत मिलती है, तो उसमें जमानतदार के लिए जरूरी होता है कि वह अपना पैन कार्ड, आधार कार्ड, राशन कार्ड, जिस ऑफिस में काम करता है, वहां का पहचान पत्र व अपनी सैलरी स्लिप से जुड़ी डिटेल कोर्ट को दे। लेकिन जिस केस में जमानत 30 हजार रुपये से ऊपर की दी जाती है, उस केस में जमानत देने वाले को पैन कार्ड, आधार कार्ड, राशन कार्ड के अलावा अपनी प्रॉपर्टी से जुड़े दस्तावेज भी देने जरूरी होते हैं। इनको तहसीलदार के पास दिखाना पड़ता है। तहसीलदार इन दस्तावेजों को देखने के बाद एक सॉल्वेंसी सर्टिफिकेट बनाता है। इस सर्टिफिकेट को उस कोर्ट में जमा करना होता है, जिस कोर्ट ने आरोपी को जमानत देने का आदेश निकाला था। 

मैजिस्ट्रेट या जज फिर अपने जुडिशल क्लर्क से कहता है कि इनका वेरिफिकेशन करवाओ। जो नियम है, उसमें जुडिशल क्लर्क को एक नोट लिखना पड़ता है और उस नोट के साथ कोर्ट में दिए गए सॉल्वेंसी सर्टिफिकेट को वेरिफिकेशन के लिए या तो डाक द्वारा संबंधित तहसीलदार के ऑफिस को भेजना पड़ता है या पुलिस के जरिए संबंधित तहसीलदार तक पहुंचना होता है। लेकिन सीनियर इंस्पेक्टर विनायक मेर, अश्वनाथ खेडकर, अमित पवार, मनीष मोरे और विजय पाटील की जांच में सामने आया कि स्योरिटी के रैकेट से जुड़े लोग तहसीलदार के पास जाने वाले वेरिफिकेशन के लिए कागज खुद ले लेते थे और फिर कुछ दिनों बाद खुद ही वेरिफिकेशन रिपोर्ट भी बना कर कोर्ट को दे देते थे। इसके बाद आरोपी जमानत पर जेल से बाहर आ जाते थे। 



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