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शिवसेना की सेंसर बोर्ड को दो टूक- बिना कट रिलीज होगी बाल ठाकरे की बायोपिक

बाला साहेब ठाकरे की बायोपिक विवादों में घिर गई है. सेंसर बोर्ड ने फिल्म के तीन डायलॉग्स पर ऐतराज जताया है. जिन डायलॉग्स को लेकर सेंसर बोर्ड ने आपत्ति जताई है, वे दक्षिण भारतीयों और बाबरी मस्जिद से जुड़े हैं. वहीं, फिल्म प्रोड्यूसर, स्क्रिप्ट राइटर और शिवसेना नेता संजय राउत ने कहा कि बिना कट के ही ट्रेलर लॉन्च किया जाएगा

संजय राउत ने इस मामले पर कहा, 'मूवी और ट्रेलर में कुछ कट लगाने को कहा है लेकिन बिना कट्स के ही ट्रेलर लॉन्च होगा. ये कोई लव स्टोरी है क्या? ये बाल ठाकरे की मूवी है और वो जैसे हैं, वैसे ही फिल्म भी उनके जीवन पर आधारित है.' फिल्म में नवाजुद्दीन सिद्दीकी मुख्य किरदार में नजर आएंगे. फिल्म 25 जनवरी, 2019 को सिनेमाघरों में रिलीज होगी.

बताया जा रहा है कि इस फिल्म को और भी खास बनाने के लिए बाला साहेब ठाकरे की निजी जीवन से जुड़ी कई चीजों को भी दिखाया जाएगा. अगले साल पर्दे पर आ रही इस फिल्म में नवाज के अलावा अमृता राव भी नजर आएंगी. मंगलवार को ख़ुद नवाज़ुद्दीन ने अपने ऑफिशियल ट्विटर अकाउंट के जरिए बुधवार को ट्रेलर रिलीज की जानकारी दी. इससे पहले नवाजुद्दीन पाकिस्तानी लेखक सआदत हसन मंटो की बायोपिक में नजर आ चुके हैं. उस फिल्म में नवाज ने 'मंटो' का किरदार ऐसी खूबसूरती से पकड़ा था कि अब दर्शकों को ठाकरे से भी काफी उम्मीदें हैं. 

कौन थे बाल ठाकरे?

बाल ठाकरे का जन्म 23 जनवरी 1926 को पुणे, महाराष्ट्र में हुआ था. समर्थक उन्हें बाला साहब कहकर संबोधित करते थे. बाल ठाकरे ने फ्री प्रेस जर्नल, मुंबई में एक कार्टूनिस्ट के रूप में अपने करियर की शुरुआत की. रविवार को उनके कार्टून टाइम्स ऑफ इंडिया में भी प्रकाशित होते थे. साल 1960 में महाराष्ट्र में गुजराती और दक्षिण भारतीय लोगों की तादाद बढ़ने का विरोध करने के लिए बाल ठाकरे ने अपने भाई के साथ मिलकर साप्ताहिक पत्रिका मार्मिक की शुरुआत की.

साल 1966 में बाल ठाकरे ने शिवसेना का गठन किया, जिसका लक्ष्य मराठियों के हितों की रक्षा करना और उन्हें नौकरियों, आवास की सुविधा उपलब्ध करवाना था. साल 1989 से शिवसेना और बाल ठाकरे के विचारों को जनता तक पहुंचाने के लिए समाचार पत्र 'सामना' को भी प्रकाशित किया जाने लगा. सामना में बाल ठाकरे ने आखिरी समय दीपावली तक लिखना जारी रखा.

विवादित बाबरी ढांचा तोड़ने के बाद उसकी खुलेआम जिम्मेदारी स्वीकार कर बाल ठाकरे ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर विवाद को न्योता दिया. मराठी मानुष के मुद्दे पर दक्षिण भारतीयों और बाद में उत्तर भारतीयों को निशाना बना चुके ठाकरे ने 1980 के दशक में हिंदुत्व का मुद्दा अपना लिया. हिंदुत्व के मुद्दे पर वोट मांगने के लिए उन्हें अपना मतदान का अधिकार तक गंवाना पड़ा. राजनीतिक नुकसान सामने देखते हुए भी उन्होंने मंडल आयोग की सिफारिशों का विरोध किया. आरक्षण का विरोध किया.

इमरजेंसी के वक्त ठाकरे ने इंदिरा गांधी को सपोर्ट करने का फैसला किया था. मुंबई बम धमाकों के बाद टाडा में फंसे संजय दत्त को बाहर निकलवाने में भी उनकी भूमिका रही. उनके सबसे पुराने दोस्त दिलीप कुमार ने जब निशाने पाकिस्तान का खिताब स्वीकार किया तब ठाकरे ने दिलीप कुमार और कार्यक्रम में शामिल हुए सुनील दत्त के खिलाफ खुलकर बयान दिए. दोनों से बातचीत बंद कर दी.

बोफोर्स घोटाले में नाम आने के बाद परेशान अमिताभ के भी वो पीछे खडे़ हुए. शाहरुख की माइ नेम इज खान का विरोध किया. क्रिकेट प्रेमी होने के बावजूद वानखेडे़ स्टेडियम की पिच उखड़वा दी. घर पर जावेद मियांदाद से मिले और सबसे पसंदीदा खिलाड़ी सचिन के खिलाफ बोलने से भी नहीं चूके. सबसे करीबी राजनीतिक दोस्त शरद पवार की सरेआम खबर लेते रहे ठाकरे.



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