क्या फर्जी हैं योगी राज में हुए एनकाउंटर?

योगी सरकार 23 महीने. 13 सौ एनकाउंटर. 60 मौत. 350 घायल और 3 हज़ार से ज़्यादा गिरफ्तार. या यूं कहें कि सरेंडर. ये यूपी में योगीराज के दौरान हुए एनकाउंटर का वो मीटर है, जो ये बता रहा है कि राज्य की पुलिस ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के एनकाउंटर के हुक्म को कितनी संदजीदगी से लिया है. यूपी पुलिस का ऑपरेशन ''ठोक दो'' इतना चर्चा में है कि अब संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार ने भी इस पर सवाल उठा दिए है. इतना ही नहीं अब तो सुप्रीम कोर्ट ने भी इस ठांय-ठांय पर अपनी नज़रें टेढ़ी करते हुए यूपी सरकार को नोटिस जारी कर योगी सरकार से जवाब मांग लिया है. लिहाज़ा अब सवाल उठ रहे हैं कि क्या यूपी में हुए एनकाउंटर फ़र्ज़ी थे?
तो क्या योगीराज में हुए एनकाउंटर फर्ज़ी थे? तो क्या अपराधियों को जानबूझकर बनाया गया निशाना? मारे गए अपराधियों को क्यों नहीं किया गया गिरफ्तार? ये सवाल अब सूबे की सरहद को पार कर अदालत की दहलीज़ तक आ गया है. क्योंकि जब से यूपी में योगीराज आया है तब से 13 सौ से ज़्यादा एनकाउंटर हुए. 59 अपराधियों की मौत हो गई. 327 अपराधी घायल हुए और 3,124 अपराधी या तो अरेस्ट हुए या उन्होंने सरेंडर कर दिया.
शायद इसीलिए ये सवाल उठ रहे हैं कि जिन अपराधियों को मारा गया क्या उन्हें ज़िंदा नहीं पकड़ा जा सकता था. बस योगी की इसी बात को सूबे के पुलिसवालों ने सीरियसली ले लिया. और ऐसे दनादन एनकाउंटर किए कि विपक्षियों को कहना ही पड़ा कि ये योगीराज नहीं बल्कि एनकाउंटर राज है. और तो और खुद यूनाइटेड नेशन ह्यूमन राइट ने भी यूपी में हुए एनकाउंटर पर सवाल उठाए. लिहाज़ा इतने आरोपों के बाद अब सुप्रीम कोर्ट ने यूपी सरकार को एनकाउंटर के सिलसिले में नोटिस जारी कर दी है.
दरअसल, अदालत में इन एनकाउंटर्स पर सवाल उठाते हुए एक पीआईएल दायर की गई है. जिसमें इस बात की मांग की गई है कि यूपी में हुई पुलिस मुठभेड़ों की अदालत की निगरानी में सीबीआई या एसआईटी से जांच कराई जाए. लिहाज़ा, पीआईएल पर आदेश देते हुए मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई ने कहा- ये एक गंभीर मामला है जिसमें विस्तार से सुनवाई की आवश्यकता है. अब इस मामले में 12 फरवरी को सुनवाई होगी.
दरअसल, यूपी में इन एनकाउंटर को लेकर विरोधी लगातार सवाल उठा रहे थे कि सूबे की पुलिस अपने राजनैतिक आका को खुश करने के लिए फर्जी मुठभेड़ों को अंजाम दे रही है. अगर सही माएने में अपराधियों को सफाया होता तो प्रदेश में लोग बिना खौफ के जी रहे होते. तो एनसीआरबी के आंकड़ें भी यूपी सरकार के दावों की पोल खोल रहे हैं.
कुछ दिन पहले यूपी पुलिस की कुछ तस्वीरें सामने आई थीं. एक सीओ साहब थाने का निरीक्षण करने पहुंचे तो पाया कि पुलिसकर्मियों को बंदूक चलानी नहीं आती. पिस्टल लोड कैसे करते हैं पता नहीं. हथियारों के नाम तो खैर कौन याद रखे. ऊपर से गोली और आंसू गैस के गोले की एक्सपाय़री डेट कब निकल गई याद ही नहीं. अब ऐसे में आप यूपी पुलिस से क्या उम्मीद करेगें? बस इतना ही कह सकते हैं कि सचमुच कमाल है योगी जी की पुलिस. अब कोई बुरा ना मान जाए तो लगे हाथ ये भी बता दें कि यूपी पुलिस की इतनी सारी काबलिय़त की पोल-पट्टी कोई और नहीं बल्कि खुद यूपी पुलिस ही खोल रही है. ऐसा एक बार नहीं, बार-बार हुआ. जब मौका आया तो बंदूक चली ही नहीं. हालांकि ये भी सरकारी बंदूकें हैं. अब बात उन तस्वीरों की जो अलग-अलग एनकाउंटर के बाद सामने आई. है ना कमाल? एक तरफ़ यूपी की सरकारी बंदूकें चलती ही नहीं थी, और फिर अचानक वही बंदूकें दनादन गोलियां उगल रही हैं. उगले भी क्यों ना? जब ट्रिगर पर ऊंगली योगी के फरमान की हो और एनकाउंटर सरकारी आदेश तो गोलियां तो चलेंगी ही.
सवाल ये है कि अचानक यूपी में एकाउंटर की झड़ी क्यों लग गई? क्या य़ूपी में क़ानून व्यवस्था इस कदर चरमरा गई है कि एनकाउंटर के अलावा कोई रास्ता ही नहीं बचा? क्या यूपी में क्रिमिनल इस कदर बेलगाम हो चुके हैं कि अचानक पूरे सोसायटी के लिए खतरा बन गए? क्या यूपी की पुलिस इस कदर बेबस हो गई कि क्राइम पर कंट्रोल ही नहीं कर पा रही है? या फिर सरकार ने सबसे आसान रास्ता चुन लिया है कि क्राइम खत्म करना है, तो क्रिमिनल को ही खत्म कर दो. पर क्या ये रास्ता सही है? क्या यूपी की कानून व्यवस्था को सुधारने के लिए एनकाउंटर ही एकमात्र रास्ता और आखिरी हथियार है? अगर हां, तो फिर जब तक ये एनकाउंटर जारी है, तब तक के लिए क्यों ना यूपी की तमाम अदालतों पर ताला लगा देना चाहिए? वैसे भी अदालतों की जगह इंसाफ़ तो अब सड़क पर ही हो रहा है. वो भी गोलियों से.
हिंदुस्तान का पहला एनकाउंटर
एनकाउंटर यानी मुठभेड़ शब्द का इस्तेमाल हिंदुस्तान और पाकिस्तान में बीसवीं सदी में शुरू हुआ. एनकाउंटर का सीधा सीधा मतलब होता है बदमाशों के साथ पुलिस की मुठभेड़. हालांकि बहुत से लोग एनकाउंटर को सरकारी क़त्ल भी कहते हैं. हिंदुस्तान में पहला एनकाउंटर 11 जनवरी 1982 को मुंबई के वडाला कॉलेज में हुआ था, जब मुंबई पुलिस की एक स्पेशल टीम ने गैंगस्टर मान्या सुरवे को छह गोलियां मारी थी. कहते हैं कि पुलिस गोली मारने के बाद उसे गाड़ी में डाल कर तब तक मुंबई की सड़कों पर घुमाती रही, जब तक कि वो मर नहीं गया. इसके बाद उसे अस्पताल ले गई. आज़ाद हिंदुस्तान का ये पहला एनकाउंटर ही विवादों में घिर गया था.
उत्तर प्रदेश में तमाम एनकाउंटर इसलिए सवाल खड़े करते हैं कि इनमें से हर एनकाउंटर ऐलानिया कह कर किया गया. सूत्रों के मुताबिक यूपी एसटीएफ और तमाम ज़िला पुलिस को बाक़ायदा घोषित अपराधियों की लिस्ट भेजी गई और उसी लिस्ट के हिसाब से यूपी में एनकाउंटर जारी हैं.
वैसे इसे पता नहीं इत्तेफाक कहेंगे या कुछ और कि पहले खुद योगी आदित्यनाथ को यूपी सरकार और यूपी पुलिस से खुद के लिए संरक्षण मांगनी पड़ी थी. वो भी संसद भवन के अंदर. तब उन्होंने बाकायदा रोते हुए कहा था कि यूपी सरकार उन्हें झूठे आपराधिक मामलों में फंसा रही है. लेकिन अब वक्त बदल चुका है. अब वही योगी यूपी की सरकार के सरदार हैं और यूपी पुलिस उनके आधीन. अब संरक्षण कोई और मांग रहा है.


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